शब्दों की चाँदनी में सजी मोहब्बत की महफ़िल, लेखिका संघ की कवि गोष्ठी में भावनाओं ने छुआ दिल; ग़ज़लों, कविताओं और मुक्तकों से गुलज़ार हुई साहित्य की शाम
आचार्य संजीव कुमार मिश्रा • बरेली, बरेली • 23/10/2026, 2:40:18 pm
बरेली लेखिका संघ बरेली के तत्वावधान में ग्रीनपार्क कॉलोनी में एक भावपूर्ण एवं साहित्यिक कवि गोष्ठी का आयोजन किया गया। प्रेम, संवेदना, जीवन-दर्शन और रिश्तों की कोमल अनुभूतियों से सजी इस काव्य संध्या में जब शब्दों ने भावनाओं का रूप लिया तो पूरी महफ़िल देर तक तालियों से गूंजती रही। कवियों एवं कवयित्रियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से जिंदगी के विविध रंगों को इस खूबसूरती से प्रस्तुत किया कि श्रोता कभी प्रेम की गहराइयों में डूबे तो कभी जीवन की सच्चाइयों से रूबरू हुए।
कवि गोष्ठी की अध्यक्षता संस्था की संरक्षक निर्मला सिंह ने की, जबकि हिमांशु श्रोत्रिय ‘निष्पक्ष’ मुख्य अतिथि रहे। मिथलेश राकेश ने विशिष्ट अतिथि का दायित्व संभाला। कार्यक्रम का सुचारु एवं काव्यमय संचालन सुप्रसिद्ध गीतकार कमल सक्सेना ने किया। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। इसके पश्चात अविनाश अग्रवाल ने माँ शारदे की वंदना प्रस्तुत कर साहित्य की इस सुंदर संध्या को भक्तिमय एवं मंगलमय बना दिया।
गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहीं निर्मला सिंह ने अपनी रचना के माध्यम से समय और जीवन के बदलते स्वरूप को बेहद संवेदनशील अंदाज में अभिव्यक्त किया। उन्होंने कहा:
“हर आने वाला दिन हमारी जिंदगी की देह एक नया लिबास ओढ़ती है और बीते दिन का लिबास उतारकर वक्त की अरगनी पर टांग देती है।”
उनकी पंक्तियों में जीवन के अनुभवों और समय की निरंतर यात्रा का गहरा दर्शन देखने को मिला।
मुख्य अतिथि हिमांशु श्रोत्रिय ‘निष्पक्ष’ ने अपनी ग़ज़ल के माध्यम से प्रेम की खूबसूरत तस्वीर पेश की। उन्होंने पढ़ा
“ग़ज़ाला पर ग़ज़ल कहने की कोशिश है मुहब्बत में,
यही लिखकर के भेजा है उसे पहले-पहल ख़त में।
सितारों से भरे इस आसमां को ओढ़नी कर दूँ,
यही कोशिश है दीवाने की जो डूबा है उल्फ़त में।”
ग़ज़ल के खूबसूरत अशआर पर श्रोताओं ने जोरदार तालियों से उनका उत्साहवर्धन किया।
कार्यक्रम का संचालन कर रहे कमल सक्सेना ने पहले श्रृंगार रस से ओत-प्रोत कई मुक्तक प्रस्तुत किए, जिन्हें श्रोताओं ने खूब सराहा। इसके बाद उन्होंने अपनी ग़ज़ल के माध्यम से तन्हाई और प्रेम की भावनाओं को स्वर दिया :
“तन्हाइयों की रात जब आधी गुजर गई,
इस दिल के आईने में इक सूरत उतर गई।
हम जिंदगी के कारवां को देखते रहे,
इक अजनबी के साथ वो जाने किधर गई।”
उनकी ग़ज़ल ने महफ़िल में प्रेम और विरह की भावनात्मक छटा बिखेर दी।
मिथलेश राकेश ने अपनी ग़ज़ल में जीवन के संघर्ष, ऊंचाइयों और आत्मसम्मान का संदेश देते हुए कहा :
“सफर जितना करो घर लौटकर आना जरूरी है,
बहुत ऊंचा उठो लेकिन जमीं पाना जरूरी है।
अगर मशहूर होने की तमन्ना पाल बैठे हो,
मुखालिफ गर हवा है उससे टकराना जरूरी है।”
उनकी रचना को भी श्रोताओं ने खूब पसंद किया।
संस्था की अध्यक्ष एवं कार्यक्रम की आयोजक अल्पना नारायण ने अपनी भावपूर्ण ग़ज़ल से प्रेम की अधूरी प्यास और रिश्तों की कसक को अभिव्यक्त किया। उन्होंने पढ़ा :
“बुझी कब प्यास इस दिल की, नदी आई स्वयं लब तक,
बिखरते रेत से सपने संभाले हम इन्हें कब तक।
तुम्हें समझा, तुम्हें जाना, न जाने क्यों मगर फिर भी,
न समझे तुम हमें अब तक, न समझे तुम हमें अब तक।”
ग़ज़ल के भावपूर्ण अशआर पर उपस्थित श्रोताओं ने जोरदार तालियों से कवयित्री का स्वागत किया।
सीमा सक्सेना ‘असीम’ ने प्रेम और साहित्य की निरंतरता की कामना करते हुए कहा :
“यह महफ़िल सजती रहे सदा,
दिलों में मोहब्बत बसती रहे सदा।
मेरी हँसी, मेरी शायरी, मेरी कविता,
मेरी हर शाम रोशन करती रहे सदा।”
मीरा प्रियदर्शनी ने अपनी कविता में मानवीय प्रेम और परोपकार का संदेश देते हुए कहा :
“मिट्टी का दीपक कहता है, खुद जलकर उजियारा दो,
टूटे हुए दिलों को जोड़ो, सबको प्रेम का सहारा दो।”
उनकी रचना ने श्रोताओं के मन को संवेदना और मानवता के उजाले से भर दिया।
मोना प्रधान ने अपनी रचना में मन की बेचैनी और जीवन की प्यास को सहज लोकभाषा के भावों से जोड़ा। उन्होंने कहा:
“पंछी उड़े आकाश में, मछली नीरे तीर,
मनुआ तो चहुं दिशा उड़े, फिर भी रहे अधीर।
दरिया का कतरा बोला, ये सागर क्यों है इठलाता,
इसका खारा जल क्या जाने, किसी पथिक प्यासे की पीर।”
रचना में लोक संवेदना और जीवन की गहरी अनुभूति का सुंदर संगम देखने को मिला।
अविनाश अग्रवाल ने अपनी ग़ज़ल के माध्यम से टूटते हुए दिल और रिश्तों की मरम्मत की भावुक पुकार को शब्द दिए:
“गिरा जा रहा है महल मेरे दिल का,
जरा आकर कर जाओ इसकी मरम्मत।”
संक्षिप्त लेकिन बेहद प्रभावशाली इन पंक्तियों ने श्रोताओं के दिल को छू लिया।
मीना अग्रवाल ने प्रेम की तपिश और विरह की पीड़ा को अपनी ग़ज़ल में स्वर देते हुए कहा :
“सारा जिस्म मेरा इश्क़ की आग में जल गया,
तड़पने के लिए यह दिल क्योंकर बच गया।”
उनकी रचना में प्रेम की तीव्रता और भावनात्मक पीड़ा की गहरी झलक दिखाई दी।
नीतू गोयल ने जीवन और रिश्तों की कठोर सच्चाइयों को अपनी कविता में बेहद बेबाक अंदाज में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा:
“प्रेम से ठगी गई हूँ, जान गई हूँ जीवन के कठोर नियम,
रिश्तों में बंधकर रहना है तो ठगे जाती रहो, कोई नुकसान नहीं।”
उनकी रचना ने रिश्तों के भीतर छिपी विडंबनाओं और जीवन के अनुभवों को प्रभावशाली ढंग से सामने रखा।
इस अवसर पर उपस्थित साहित्यप्रेमियों ने सभी रचनाकारों की प्रस्तुतियों का तालियों से उत्साहवर्धन किया। पूरी काव्य संध्या प्रेम, संवेदना, विरह, जीवन-दर्शन और मानवीय रिश्तों के विविध रंगों से सराबोर रही। कहीं मोहब्बत ने दस्तक दी तो कहीं तन्हाई ने दिल को छुआ और कहीं जीवन की सच्चाइयों ने श्रोताओं को सोचने पर विवश किया।
अंत में कार्यक्रम की आयोजक एवं संस्था की अध्यक्ष अल्पना नारायण ने सभी अतिथियों, रचनाकारों और साहित्यप्रेमियों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि साहित्य और कविता समाज को संवेदनशील बनाने के साथ-साथ दिलों को जोड़ने का भी कार्य करते हैं। इसी भाव के साथ कवि गोष्ठी का समापन हुआ।