सिर्फ ढिंढोरा या कछौना में बह रही विकास की गंगा? क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों ने धरातल पे कितना किया काम!
विमलेश सिंह • भारत, हरदोई • 23/10/2026, 6:52:33 pm
हरदोई, उत्तर प्रदेश। चुनाव के समय विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। कहीं सड़कों का जिक्र होता है, कहीं धार्मिक स्थलों के सौंदर्यीकरण का, तो कहीं जनता को बेहतर सुविधाएं देने के वादे किए जाते हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि विकास का लाभ आम जनता तक कितना पहुंच रहा है?
जनपद हरदोई के कछौना क्षेत्र में भी विकास को लेकर ऐसे ही सवाल उठते हैं। क्या यहां वास्तव में विकास की गंगा बह रही है या विकास के कुछ चुनिंदा कार्यों को ही पूरे क्षेत्र की तरक्की के रूप में पेश किया जा रहा है?
इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए मंदिरों के सौंदर्यीकरण के लिए स्वीकृत धनराशि, नगर में लगाए गए वाटर कूलरों की स्थिति और स्वास्थ्य एवं शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं पर ध्यान देना जरूरी है।
मंदिरों के सौंदर्यीकरण के लिए करोड़ों की मंजूरी
दैनिक भास्कर में 15 मार्च 2024 को प्रकाशित खबर के अनुसार, नगर कछौना के केंद्र में स्थित पौराणिक बाबा कुशीनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार और सौंदर्यीकरण की मांग उठाई गई थी। खबर के मुताबिक, मंदिर ट्रस्ट के कर्मचारी और नगर अध्यक्ष राधारमण शुक्ला ने विधान परिषद सदस्य अशोक अग्रवाल के समक्ष यह मांग रखी।
इसके बाद अशोक अग्रवाल ने मंदिर के सौंदर्यीकरण के लिए शासन को पत्र लिखा। खबर के अनुसार, पर्यटन विभाग की टीम ने मंदिर परिसर का निरीक्षण किया और भूमि का आकलन किया। इसके बाद मंदिर के सौंदर्यीकरण के लिए 1 करोड़ 51 लाख 54 हजार रुपये की धनराशि स्वीकृत होने की जानकारी प्रकाशित हुई।
धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों का संरक्षण महत्वपूर्ण है। ऐसे स्थल स्थानीय संस्कृति, आस्था और विरासत से जुड़े होते हैं। उनके विकास पर सवाल उठाना हमारा उद्देश्य नहीं है।
लेकिन जब सरकारी धन से विकास कार्यों की बात होती है, तो यह सवाल उठना भी स्वाभाविक है कि क्षेत्र की दूसरी जरूरी समस्याओं के समाधान के लिए क्या प्रयास किए जा रहे हैं?
बाबा लंगड़ेदास कुटी के लिए भी एक करोड़ रुपये
दैनिक भास्कर में 21 अगस्त 2025 को प्रकाशित एक अन्य खबर के अनुसार, बालामऊ विधानसभा क्षेत्र के विधायक रामपाल वर्मा ने कछौना कोतवाली के निकट स्थित बाबा लंगड़ेदास कुटी के जीर्णोद्धार और सौंदर्यीकरण के लिए शासन को पत्र लिखा था।
प्रकाशित खबर में इस कार्य के लिए एक करोड़ रुपये की स्वीकृति मिलने का उल्लेख किया गया था। खबर के अनुसार, स्थानीय नागरिक लंबे समय से इस कार्य की मांग कर रहे थे और विधायक के प्रयासों के बाद इसे मंजूरी मिली।
इन दोनों प्रकाशित खबरों में उल्लिखित धनराशियों को जोड़ें, तो मंदिरों के सौंदर्यीकरण के लिए कुल 2 करोड़ 51 लाख 54 हजार रुपये की स्वीकृति का उल्लेख सामने आता है।
यहां एक बात स्पष्ट रहनी चाहिए: स्वीकृत धनराशि और वास्तव में खर्च हुई धनराशि अलग-अलग बातें हैं। इन परियोजनाओं की मौजूदा स्थिति, वास्तविक व्यय और निर्माण कार्य की गुणवत्ता की पुष्टि संबंधित सरकारी अभिलेखों से की जानी चाहिए।
वाटर कूलर लगे, लेकिन क्या जनता को राहत मिली?
कछौना नगर क्षेत्र में लाखों रुपये की लागत से वाटर कूलर लगाए जाने की बात सामने आती रही है। लेकिन स्थानीय स्तर पर इनकी कार्यशीलता को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
कुछ वाटर कूलरों से ठंडे पानी के बजाय सामान्य या गर्म पानी मिलने और कुछ से पानी नहीं निकलने की शिकायतें हैं।
यदि सार्वजनिक धन से लगाए गए वाटर कूलर नियमित रूप से काम नहीं कर रहे हैं, तो उनकी स्थापना पर खर्च हुई रकम का वास्तविक लाभ जनता को कैसे मिलेगा?
क्या संबंधित विभाग इनकी नियमित देखरेख करता है? क्या खराब वाटर कूलरों की मरम्मत के लिए कोई व्यवस्था है? और क्या नगर प्रशासन ने इनकी कार्यशीलता की जांच कराई है?
ये ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब नगर प्रशासन को देना चाहिए। क्योंकि विकास का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कोई सुविधा स्थापित कर दी गई, बल्कि इस आधार पर होना चाहिए कि वह जनता के कितने काम आ रही है।
कछौना सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की हालत पर कौन देगा जवाब?
अब बात उस बुनियादी सुविधा की, जिसकी जरूरत किसी भी परिवार को कभी भी पड़ सकती है—स्वास्थ्य सेवा।
कछौना सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और क्षेत्र के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की व्यवस्थाओं को लेकर स्थानीय नागरिकों की अपेक्षाएं हैं। अस्पतालों में जरूरी सुविधाएं, पर्याप्त चिकित्सकीय सेवाएं, जांच की व्यवस्था, दवाओं की उपलब्धता और मरीजों को समय पर उपचार मिलना किसी भी क्षेत्र के विकास के अहम पैमाने हैं।
ऐसे में सवाल है कि यदि जनप्रतिनिधि धार्मिक स्थलों के सौंदर्यीकरण के लिए शासन को पत्र लिखकर बजट स्वीकृत कराने की पहल कर सकते हैं, तो स्वास्थ्य केंद्रों की समस्याओं को दूर कराने के लिए भी वैसी ही प्रभावी पहल क्यों नहीं होनी चाहिए?
क्या स्वास्थ्य केंद्रों की मौजूदा स्थिति का आकलन कराकर जरूरी संसाधनों की मांग शासन के सामने रखी गई है? यदि रखी गई है, तो उस पर क्या कार्रवाई हुई? और यदि समस्याएं अब भी बनी हुई हैं, तो उनके समाधान की समयसीमा क्या है?
इन सवालों का जवाब तथ्यों और सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर मिलना चाहिए। स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष का मुद्दा नहीं, बल्कि आम नागरिक के जीवन और अधिकार से जुड़ा विषय है।
सरकारी स्कूलों और गरीब बच्चों के भविष्य पर भी हो चर्चा
किसी क्षेत्र का विकास केवल सड़कों, भवनों और धार्मिक स्थलों के सौंदर्यीकरण से पूरा नहीं होता। सरकारी विद्यालयों की स्थिति, शिक्षकों की उपलब्धता, पढ़ाई की गुणवत्ता, भवनों की सुरक्षा, पेयजल और शौचालय जैसी सुविधाएं भी विकास की तस्वीर का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
कछौना क्षेत्र के सरकारी विद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं की क्या स्थिति है? क्या बच्चों को बेहतर शैक्षणिक वातावरण मिल रहा है? क्या जरूरतमंद विद्यालयों की समस्याओं को दूर करने के लिए शासन से बजट मांगा गया है?
इन सवालों पर भी उतनी ही गंभीरता से चर्चा होनी चाहिए, जितनी चर्चा बड़े विकास कार्यों के समय होती है।
क्योंकि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले अनेक बच्चे ऐसे परिवारों से आते हैं, जिनके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा ही बेहतर भविष्य का सबसे महत्वपूर्ण रास्ता है।
जनप्रतिनिधियों से पांच सीधे सवाल
कछौना के विकास को लेकर संबंधित जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के सामने कुछ स्पष्ट सवाल रखे जाने चाहिए:
1. बाबा कुशीनाथ मंदिर और बाबा लंगड़ेदास कुटी के लिए स्वीकृत धनराशि में से अब तक कितना खर्च हुआ है और दोनों परियोजनाओं की वर्तमान स्थिति क्या है?
2. नगर क्षेत्र में लगाए गए वाटर कूलरों की नियमित देखरेख और मरम्मत की जिम्मेदारी किस विभाग की है?
3. कछौना सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की समस्याओं को दूर करने के लिए शासन को कौन-कौन से प्रस्ताव भेजे गए हैं?
4. सरकारी विद्यालयों में बुनियादी सुविधाओं और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए हैं?
5. इन सभी विकास कार्यों की प्रगति, खर्च और गुणवत्ता का सार्वजनिक विवरण जनता को कहां उपलब्ध कराया जाएगा?
इन सवालों का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि जनता के सामने विकास की पूरी तस्वीर लाना है।
निष्कर्ष: विकास का प्रमाण प्रचार नहीं, जनता को मिलने वाली सुविधा है
धार्मिक स्थलों का सौंदर्यीकरण हो, सड़क निर्माण हो, वाटर कूलर लगाए जाएं या नए भवन बनाए जाएं—इन सभी कार्यों का अपना महत्व है। लेकिन विकास की प्राथमिकताएं तय करते समय स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल और दूसरी बुनियादी सुविधाओं को भी बराबर महत्व मिलना चाहिए।
यदि किसी मंदिर का सौंदर्यीकरण होता है, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन साथ ही यह भी पूछा जाना चाहिए कि क्या अस्पतालों में मरीजों को बेहतर उपचार मिल रहा है? क्या सरकारी विद्यालयों में बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल रही है? क्या सार्वजनिक सुविधाएं नियमित रूप से काम कर रही हैं?
कछौना में विकास की गंगा बह रही है या विकास के दावों का ढिंढोरा पीटा जा रहा है—इसका फैसला भाषणों से नहीं, जमीनी हकीकत और उपलब्ध तथ्यों से होना चाहिए।
जनता को केवल विकास की घोषणाएं नहीं, बल्कि उनके परिणाम भी देखने का अधिकार है। जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछना लोकतंत्र का हिस्सा है और उन सवालों के जवाब देना सार्वजनिक जवाबदेही का।
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