शिलान्यास की चमक फीकी, विकास की राह में अटका 132.82 करोड़ का सपना; अधूरे ओवरब्रिज ने तोड़ी ग्रामीणों की उम्मीद, वर्षों बाद भी जाम से जूझ रहा फरीदपुर
आचार्य संजीव कुमार मिश्रा • बरेली, बरेली • 18/10/2026, 12:12:57 pm
बरेली फरीदपुर कभी शिलान्यास के साथ जिन सपनों ने आकार लिया था, आज वही सपने अधूरे पुल के ढांचे में कैद नजर आ रहे हैं। विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच फरीदपुर-बुखारा मार्ग स्थित रेलवे क्रासिंग गेट संख्या-352 सी पर प्रस्तावित ओवरब्रिज की सुस्त रफ्तार ने क्षेत्रीय जनता के इंतजार को लंबा कर दिया है। करोड़ों रुपये की इस महत्वपूर्ण परियोजना का उद्देश्य रेलवे फाटक पर लगने वाले जाम से निजात दिलाना और हजारों लोगों के आवागमन को सुगम बनाना था, लेकिन वर्षों बाद भी निर्माण पूरा न होने से जनता की उम्मीदें अब सवालों में बदलती जा रही हैं।
51.37 करोड़ की परियोजना, 620.65 मीटर लंबाई और इंतजार का कोई अंत नहीं
फरीदपुर-बुखारा मार्ग पर रेलवे क्रासिंग गेट संख्या-352 सी पर 02 लेन रेल उपरिगामी सेतु का निर्माण प्रस्तावित किया गया। परियोजना की लंबाई 620.65 मीटर तथा अनुमानित लागत करीब 51.37 करोड़ रुपये है।
जब इस परियोजना का शिलान्यास हुआ था, तब क्षेत्रवासियों ने इसे केवल एक पुल नहीं, बल्कि वर्षों पुरानी यातायात समस्या के स्थायी समाधान के रूप में देखा था। लोगों को उम्मीद थी कि पुल बनते ही रेलवे फाटक पर बार-बार रुकने की मजबूरी खत्म होगी, समय बचेगा और फरीदपुर-बुखारा मार्ग से जुड़े ग्रामीण क्षेत्रों को आवागमन की बड़ी राहत मिलेगी।
लेकिन वक्त गुजरता गया और विकास की वह तस्वीर, जिसकी कल्पना शिलान्यास के समय की गई थी, आज अधूरे निर्माण के बीच धुंधली होती नजर आ रही है।
शिलान्यास के दिन आंखों में चमक थी, आज निगाहें पुल की अधूरी दीवारों पर
शिलान्यास के समय क्षेत्रवासियों के चेहरों पर खुशी थी। उन्हें लगा था कि अब रेलवे फाटक के जाम से मुक्ति की उल्टी गिनती शुरू हो गई है। मगर निर्माण की धीमी गति ने इस उत्साह को धीरे-धीरे बेचैनी में बदल दिया।
आज स्थिति यह है कि ग्रामीण और राहगीर अधूरे निर्माण को देखते हुए यही सवाल पूछने को मजबूर हैं कि आखिर जिस परियोजना का उद्देश्य जनता को राहत देना था, उसकी रफ्तार इतनी धीमी क्यों है?
क्या शिलान्यास के बाद जिम्मेदारी केवल पत्थर पर नाम लिखे जाने तक सीमित रह जाती है?
यह सवाल अब केवल ग्रामीणों का नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था से जुड़ा है जो करोड़ों रुपये की जनहितकारी परियोजनाओं को समय पर पूरा कराने की जिम्मेदारी संभालती है।
रेलवे फाटक बंद होते ही थम जाती है जिंदगी
352 सी रेलवे फाटक पर निर्माण कार्य होने के कारण क्षेत्र के लोगों के लिए रोजमर्रा की परेशानी का पर्याय बन चुका है। वहीं ग्रामीणों को गौसगंज नहर रेलवे क्रासिंग गेट संख्या 352 AC वहीं दूसरी रेलवे फाटक नवादा वन गेट संख्या 351 C से गुजरने को लोग मजबूर हैं ट्रेन के गुजरने से पहले फाटक बंद होते ही दोनों ओर वाहनों की कतारें लग जाती हैं। कुछ मिनटों का इंतजार कई बार लंबी जाम की स्थिति में बदल जाता है।
इसका असर केवल वाहन चालकों तक सीमित नहीं है। विद्यार्थी, व्यापारी, नौकरीपेशा लोग, किसान और मरीज तक इस समस्या से प्रभावित होते हैं। आपात स्थिति में यही इंतजार किसी परिवार के लिए बेहद भारी साबित हो सकता है।
यदि ओवरब्रिज समय से पूरा हो जाता तो रेलवे फाटक पर निर्भरता काफी कम हो सकती थी। लेकिन अधूरे निर्माण के कारण जनता आज भी उसी फाटक, उसी जाम और उसी इंतजार के बीच खड़ी है।
352 सी बनाम 344 ए: सवाल पुल की लंबाई का नहीं,निर्माण की रफ्तार का है!
मामला तब और गंभीर हो जाता है जब फरीदपुर के रेलवे क्रासिंग गेट संख्या 352 सी की तुलना फतेहगंज पूर्वी से दातागंज मार्ग पर बिलपुर रेलवे क्रासिंग संख्या-344 ए की परियोजना से की जाती है।
गेट संख्या 352 सी पर प्रस्तावित ओवरब्रिज की लंबाई 620.65 मीटर और अनुमानित लागत करीब 51.37 करोड़ रुपये है। जबकि पुल सर्पाकार में है।
वहीं रेलवे क्रासिंग गेट संख्या 344 ए पर निर्माणाधीन ओवरब्रिज की लंबाई लगभग 707.522 मीटर तथा अनुमानित लागत करीब 81.44 करोड़ रुपये बताई गई है। जबकि पुल का आकार सीधा है
दोनों परियोजनाओं की अनुमानित लागत को जोड़ें तो आंकड़ा लगभग 132.82 करोड़ रुपये तक पहुंचता है।
यहीं से क्षेत्रवासियों का सवाल और गंभीर हो जाता है—जब दोनों परियोजनाएं जनता की सुविधा, यातायात सुगमता और रेलवे फाटक की समस्या से जुड़ी हैं, तो फिर इनके निर्माण की गति को लेकर इतना अंतर क्यों दिखाई दे रहा है?
क्या कहीं निगरानी कमजोर है? क्या निर्माण में कोई तकनीकी या प्रशासनिक अड़चन है? या फिर परियोजना की गति पर जिम्मेदार अधिकारियों की पर्याप्त निगाह नहीं है?
इन सवालों का जवाब जनता जानना चाहती है।
शिलान्यास पट्टिका चमकती रही, मगर राहगीरों की राह नहीं बदली
किसी भी विकास परियोजना की सफलता शिलान्यास समारोह से नहीं, बल्कि उसके पूर्ण होने और जनता को सुविधा मिलने से तय होती है।
शिलान्यास के दिन मंच सजा, पूजन हुआ, उम्मीदें जगीं और विकास की तस्वीर सामने रखी गई। लेकिन उसके बाद निर्माण की गति यदि सुस्त पड़ जाए तो जनता के लिए वह शिलान्यास केवल एक स्मृति बनकर रह जाता है।
फरीदपुर का 352 सी ओवरब्रिज इसी विरोधाभास की तस्वीर बनता जा रहा है
पत्थर पर विकास की घोषणा, जमीन पर अधूरा निर्माण और सड़क पर जनता का इंतजार।
धूल,जाम और अधूरे निर्माण के बीच कट रहे हैं लोगों के दिन
अधूरे निर्माण से जुड़े क्षेत्र में धूल, यातायात संबंधी परेशानियां और दुर्घटना की आशंका को लेकर भी स्थानीय लोग चिंतित हैं।
रोजाना इस मार्ग से गुजरने वाले लोगों के लिए यह समस्या अब सामान्य सी लगने लगी है, लेकिन इसकी कीमत उनके समय, ईंधन और मानसिक परेशानी के रूप में लगातार चुकाई जा रही है।
किसी को फाटक खुलने का इंतजार है, किसी को स्कूल पहुंचने की जल्दी, किसी को अस्पताल पहुंचना है तो किसी को रोजी-रोटी के लिए समय पर अपने गंतव्य तक पहुंचना है।
जनता का समय भी विकास की कीमत है!और यह कीमत वर्षों से जनता ही चुका रही है।
ग्रामीण बोले—अब आश्वासन नहीं, जमीन पर चाहिए तैयार पुल
क्षेत्रीय लोगों की मांग है कि शासन, जिला प्रशासन और उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम इस परियोजना की प्रगति की गंभीरता से समीक्षा करें।
निर्माण में देरी के कारणों को सार्वजनिक किया जाए और शेष कार्य के लिए स्पष्ट समयसीमा निर्धारित की जाए।
ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें अब नई घोषणा, नया आश्वासन या केवल निरीक्षण नहीं चाहिए। उन्हें ऐसा पुल चाहिए जिस पर वे सुरक्षित और सुगम तरीके से आवागमन कर सकें।
जनता यह भी जानना चाहती है कि!
परियोजना में अब तक कितना कार्य पूरा हुआ?
अब तक कितनी धनराशि खर्च की जा चुकी है?
निर्माण में देरी का वास्तविक कारण क्या है?
परियोजना को पूरा करने की वर्तमान समयसीमा क्या है?
निर्माण कार्य की निगरानी कौन कर रहा है?
देरी के लिए यदि कोई जिम्मेदारी तय होती है तो वह किसकी होगी?
सबसे बड़ा सवाल: 132.82
करोड़ के सपनों का हिसाब कौन देगा?
फरीदपुर का 352 सी और फतेहगंज पूर्वी का 344 ए:
दोनों परियोजनाएं मिलकर लगभग 132.82 करोड़ रुपये के विकास निवेश की तस्वीर पेश करती हैं। लेकिन जनता के लिए विकास का वास्तविक अर्थ तभी है जब करोड़ों की योजनाएं धरातल पर समय से पूरी हों।
51.37 करोड़ की लागत, 620.65 मीटर लंबाई और वर्षों से पुल की प्रतीक्षा करती जनता;अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि पुल कब बनेगा, सवाल यह है कि आखिर जनता को कब तक इंतजार करना पड़ेगा?
फरीदपुर का अधूरा ओवरब्रिज अब केवल कंक्रीट और लोहे का अधूरा ढांचा नहीं रह गया है। यह
जनता की उम्मीद, सरकारी दावे और प्रशासनिक जवाबदेही—तीनों के बीच खड़ा एक बड़ा सवाल बन चुका है।
जरूरत अब कागजों में प्रगति दिखाने की नहीं, बल्कि जमीन पर काम की रफ्तार बढ़ाने की है।
संबंधित अधिकारियों को चाहिए कि मौके पर पहुंचकर वास्तविक स्थिति का जायजा लें,
बाधाओं को दूर कराएं और निर्माण को निर्धारित समयसीमा में पूरा कराने की ठोस कार्रवाई करें।
क्योंकि जनता ने पुल का सपना देखा था, शिलान्यास की तस्वीर नहीं।
जनता को सुविधा चाहिए, सिर्फ घोषणा नहीं।
और विकास की असली पहचान शिलान्यास पट्टिका नहीं, बल्कि उस पुल से गुजरती जनता होती है।