12 करोड़ का सैटेलाइट बस अड्डा, यात्रियों का टोटा; EV चार्जिंग स्टेशन भी इंतजार में
राज प्रताप सिंह • कटरा खुदागंज, शाहजहांपुर • 27/10/2026, 6:52:51 pm
12 करोड़ का सैटेलाइट बस अड्डा, यात्रियों का टोटा; EV चार्जिंग स्टेशन भी इंतजार में
रोजा में सरकारी धन से तैयार सुविधाओं के इस्तेमाल पर उठे सवाल, बसों के संचालन और राजस्व को लेकर भी चिंता
शाहजहांपुर। जनपद के रोजा स्थित सैटेलाइट बस अड्डे पर यात्रियों की कम संख्या को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। लगभग 12 करोड़ रुपये की लागत से तैयार इस बस अड्डे का उद्देश्य यात्रियों को बेहतर परिवहन सुविधाएं उपलब्ध कराना और बसों के संचालन को व्यवस्थित करना था। लेकिन यहां बसों की आवाजाही और यात्रियों की संख्या के बीच बड़ा अंतर सामने आने की बात कही जा रही है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, बस अड्डे पर प्रतिदिन आने वाली बसों का औसत करीब 60 बताया जा रहा है, जबकि सफर करने वाले यात्रियों की औसत संख्या महज 10 होने का दावा किया जा रहा है। यदि ये आंकड़े सही हैं, तो बस अड्डे की उपयोगिता, संचालन व्यवस्था और यात्रियों को आकर्षित करने की रणनीति पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
बसें आ रहीं, लेकिन यात्री कहां?
सैटेलाइट बस अड्डे पर बसों की आवाजाही के बावजूद यात्रियों की संख्या कम रहने का मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। सवाल यह है कि आखिर यात्रियों को इस बस अड्डे तक पहुंचने में किन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। क्या बसों के रूट और समय-सारिणी यात्रियों की जरूरतों के अनुरूप नहीं हैं, या फिर बस अड्डे का स्थान लोगों के लिए सुविधाजनक साबित नहीं हो रहा है?
इन सवालों के जवाब तलाशना जरूरी है। यदि यात्रियों को बस अड्डे तक पहुंचने के लिए अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती है या वहां से अपने गंतव्य तक जाने के पर्याप्त साधन उपलब्ध नहीं हैं, तो इसका असर यात्री संख्या पर पड़ सकता है। हालांकि, इन संभावित कारणों की पुष्टि के लिए संबंधित विभाग की जांच और वास्तविक आंकड़ों की आवश्यकता है।
बसों के संचालन में ईंधन, चालक-परिचालक और अन्य परिचालन खर्च शामिल होते हैं। ऐसे में यदि बसों में यात्रियों की संख्या कम रहती है, तो परिवहन निगम की आय पर असर पड़ने की आशंका बनी रहती है। इसलिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि बस अड्डे से कितनी बसें संचालित हो रही हैं, उनमें औसतन कितने यात्री सफर कर रहे हैं और उनसे निगम को कितना राजस्व प्राप्त हो रहा है।
चार्जिंग स्टेशन तैयार, संचालन का इंतजार
सैटेलाइट बस अड्डे के ठीक पीछे इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए चार्जिंग स्टेशन भी बनाया गया है। इसी तरह का एक अन्य चार्जिंग स्टेशन रोडवेज बस अड्डे पर भी तैयार किए जाने की जानकारी है। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य इलेक्ट्रिक वाहनों को चार्जिंग की सुविधा उपलब्ध कराना और स्वच्छ परिवहन व्यवस्था को बढ़ावा देना हो सकता है।
लेकिन इन चार्जिंग स्टेशनों के संचालन की मौजूदा स्थिति को लेकर सवाल उठ रहे हैं। बुनियादी ढांचा तैयार होने के बावजूद यदि चार्जिंग सुविधाओं का नियमित इस्तेमाल शुरू नहीं हुआ है, तो इसका लाभ आम लोगों और परिवहन व्यवस्था को नहीं मिल पाएगा।
ऐसे में संबंधित विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि दोनों चार्जिंग स्टेशन कब से संचालित होंगे। क्या इनके लिए बिजली कनेक्शन, तकनीकी परीक्षण और संचालन संबंधी औपचारिकताएं पूरी हो चुकी हैं? यदि कोई काम अधूरा है, तो उसे पूरा करने में देरी क्यों हो रही है? इन सवालों पर स्थिति स्पष्ट होने से ही पता चल सकेगा कि तैयार सुविधाओं का लाभ जनता को कब तक मिल पाएगा।
नगर निगम के इलेक्ट्रिक वाहन भी सवालों के घेरे में
दूसरी ओर, नगर निगम के इलेक्ट्रिक वाहनों की स्थिति भी चिंता का विषय बताई जा रही है। शहरी सेवाओं को बेहतर बनाने और पर्यावरण के अनुकूल परिवहन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से खरीदे गए वाहनों का नियमित संचालन और रखरखाव बेहद जरूरी है। लेकिन उपलब्ध जानकारी के अनुसार, कुछ इलेक्ट्रिक वाहन लंबे समय से खड़े हैं और उनकी हालत खराब होती जा रही है।
यदि सरकारी धन से खरीदे गए वाहन उपयोग में आने के बजाय खड़े-खड़े खराब हो रहे हैं, तो यह खरीद के साथ-साथ उनके रखरखाव और संचालन की व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है। वाहनों की बैटरी, तकनीकी उपकरणों और अन्य जरूरी हिस्सों का समय पर रखरखाव नहीं होने से नुकसान बढ़ सकता है।
ऐसे में नगर निगम को यह स्पष्ट करना चाहिए कि कितने इलेक्ट्रिक वाहन खरीदे गए, उनमें से कितने वर्तमान में संचालित हैं और कितने खराब या निष्क्रिय अवस्था में खड़े हैं। साथ ही, यह भी बताया जाना चाहिए कि निष्क्रिय वाहनों को दोबारा उपयोग में लाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
सरकारी धन खर्च होने के बाद जवाबदेही भी जरूरी
रोजा का सैटेलाइट बस अड्डा, दोनों चार्जिंग स्टेशन और नगर निगम के इलेक्ट्रिक वाहन अलग-अलग परियोजनाओं का हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन इन सभी से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सवाल समान है—सरकारी धन से तैयार की गई सुविधाओं का वास्तविक लाभ जनता को कितना मिल रहा है?
केवल भवन बनाना, उपकरण स्थापित करना या वाहन खरीद लेना किसी परियोजना की सफलता नहीं माना जा सकता। उसकी उपयोगिता इस बात से तय होती है कि वह सुविधा कितनी नियमितता से संचालित हो रही है और आम लोगों को उससे कितना लाभ मिल रहा है।
सैटेलाइट बस अड्डे पर यात्रियों की वास्तविक संख्या का सत्यापन, बसों के संचालन और राजस्व का विवरण, चार्जिंग स्टेशनों की स्थिति तथा नगर निगम के निष्क्रिय वाहनों की समीक्षा कराई जानी चाहिए। यदि कहीं संचालन संबंधी कमी या लापरवाही सामने आती है, तो उसे दूर करने के लिए जिम्मेदार विभागों को समयबद्ध कार्रवाई करनी चाहिए।
अब निगाहें संबंधित विभागों की जवाबदेही पर हैं। जरूरत इस बात की है कि तैयार सुविधाओं को केवल सरकारी परियोजना के रूप में नहीं, बल्कि आम जनता की जरूरतों से जोड़कर देखा जाए। करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद यदि बस अड्डे पर यात्रियों की संख्या कम बनी रहती है, चार्जिंग स्टेशन उपयोग में नहीं आते और इलेक्ट्रिक वाहन खड़े-खड़े खराब होते हैं, तो इन व्यवस्थाओं की समीक्षा कर कमियों को दूर करना जरूरी है। आखिरकार, सरकारी योजनाओं की असली सफलता निर्माण में नहीं, बल्कि उनके प्रभावी संचालन और जनता को मिलने वाले लाभ में है।